गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

उतर आया है

वक़्त की थपकियों नें सुलाया है।  
फिर कोई चाँद ज़मीं पे उतर आया है।   

कुछ हरे ज़ख्म हैं तो ज़िंदा हूँ ,
फिर किसी ने खाबों में गुदगुदाया है। 

कैसे ज़ज़्बात हैं, कई बार सिहर जाता हूँ,
कोई शख्स छूकर मुझे जगाया है। 

एक बच्चे की तरह, दौड़ जाता हूँ,
कोई खिलौनों का बाजार लिए आया हैं। 


बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

साथ मेरा छोड़ कर

वो सलामत रह न पाया,
साथ मेरा छोड़ कर। 
फिर कभी भी उठ न पाया,
साथ मेरा छोड़ कर। 

मेरे लब्ज़ों के बदौलत,
बात थी, आवाज़ थी। 
फिर कभी कुछ कह न पाया, 
साथ मेरा छोड़ कर।  

उँगलियों के दरमियां,
उंगलियां मेरी भी थीं,
कोई रिश्ता निभा न पाया, 
साथ मेरा छोड़ कर। 

एक ज़र्ज़र सा मकाँ हूँ,
फूटता हूँ, टूटता हूँ,
वो भी तो हंस न पाया,
साथ मेरा छोड़ कर।  

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

उसने

ख़त के पुर्ज़े उड़ा दिया उसने।
किस बात की सज़ा दिया उसने।

मेरा फ़र्ज़ था उसका हिफाज़त करना,
पर गुनहगार बना दिया उसने।

उसको पलकों पर बिठाकर रखा था,
फिरभी नज़रों से गिरा दिया उसने।

उसी के साथ खुशियां तलाशता था मैं,
छोड़कर हाथ, अपनी औकात बता दिया उसने।






गुरुवार, 10 अगस्त 2017

कुछ कहीं टूट सा गया है!

कुछ कहीं टूट सा गया है।
लगता है कुछ छूट सा गया है।

अब इबादत में मन नही लगता,
शायद वो मुझसे रूठ सा गया है।

कोई क़ुर्बत ही नही अब दरमियाँ,
जो कुछ भी था, मिट सा गया है।

न जाने क्या हो गया उस दिन,
बुलबुला था, फूट सा गया है। 

रविवार, 8 जनवरी 2017

फिर एक बार

एक और शाम
और तन्हाई.
फिर एक बार
तेरी याद आई.

बेनाम सा दर्द
उठा है फिर से.
जस्तुजू -ए-दीद
फिर उमड आई.

आग में क्या क्या
जला है देखो.
जिस्म तो जिस्म
हद-ए-दिल-रूबाई.

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

कौन हूँ मैं?

मैं क्या हूँ, कौन हूँ मैं?
बस मौत का ज़रिया हूँ मैं.

मेरी आँखों में झाँककर देखो,
दर्द-ए-ग़म का दरिया हूँ मैं.

फिर से आकर ज़रा मुझे देखो,
अपने साथ क्या किया हूँ मैं.

तल्ख़ बातों से कुछ नहीं मिलता,
बंद होठों से सब सहा हूँ मैं.

अब किसी आग से डर नहीं लगता,
पिघली हुई मोम का कतरा हूँ मैं.

दूर वीराने में रौशनी नज़र आई ,
तेरी उम्मीद पर ज़िंदा हूँ मैं.
 

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

फ़ितूर

 

ये दिमाग़ का फितूर है 
या इश्क़ की बातें हैं,
कभी उनको बताता हूँ ,
कभी खुद को बताते हैं. 
 
तुम जब से गए हो,
मुझे होश नहीं है. 
सिर्फ तुमको सोंचता हूँ,
और दिन को बिताते हैं. 
 
तुम आओगे जल्द फिर,
ये वादा है तुम्हारा. 
हम लम्हे जोड़ जोड़कर ,
दिन को मिटाते हैं. 
 
फक्र तुमसे मुहब्बत का,
बहुत है मुझे लेकिन,
दुनिया से छुपाता हूँ,
कभी तुमसे छुपाते हैं. 
 
जो जान गयी दुनिया,
कोई फ़िक़्र नहीं है,
तुम जो हमारे हो,
और हम जो तुम्हारे हैं. 
 
राघवेश रंजन