गुरुवार, 10 अगस्त 2017

कुछ कहीं टूट सा गया है!

कुछ कहीं टूट सा गया है।
लगता है कुछ छूट सा गया है।

अब इबादत में मन नही लगता,
शायद वो मुझसे रूठ सा गया है।

कोई क़ुर्बत ही नही अब दरमियाँ,
जो कुछ भी था, मिट सा गया है।

न जाने क्या हो गया उस दिन,
शायद बुलबुले थे, फुट सा गया है। 

रविवार, 8 जनवरी 2017

फिर एक बार

एक और शाम
और तन्हाई.
फिर एक बार
तेरी याद आई.

बेनाम सा दर्द
उठा है फिर से.
जस्तुजू -ए-दीद
फिर उमड आई.

आग में क्या क्या
जला है देखो.
जिस्म तो जिस्म
हद-ए-दिल-रूबाई.

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

कौन हूँ मैं?

मैं क्या हूँ, कौन हूँ मैं?
बस मौत का ज़रिया हूँ मैं.

मेरी आँखों में झाँककर देखो,
दर्द-ए-ग़म का दरिया हूँ मैं.

फिर से आकर ज़रा मुझे देखो,
अपने साथ क्या किया हूँ मैं.

तल्ख़ बातों से कुछ नहीं मिलता,
बंद होठों से सब सहा हूँ मैं.

अब किसी आग से डर नहीं लगता,
पिघली हुई मोम का कतरा हूँ मैं.

दूर वीराने में रौशनी नज़र आई ,
तेरी उम्मीद पर ज़िंदा हूँ मैं.
 

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

फ़ितूर

 

ये दिमाग़ का फितूर है 
या इश्क़ की बातें हैं,
कभी उनको बताता हूँ ,
कभी खुद को बताते हैं. 
 
तुम जब से गए हो,
मुझे होश नहीं है. 
सिर्फ तुमको सोंचता हूँ,
और दिन को बिताते हैं. 
 
तुम आओगे जल्द फिर,
ये वादा है तुम्हारा. 
हम लम्हे जोड़ जोड़कर ,
दिन को मिटाते हैं. 
 
फक्र तुमसे मुहब्बत का,
बहुत है मुझे लेकिन,
दुनिया से छुपाता हूँ,
कभी तुमसे छुपाते हैं. 
 
जो जान गयी दुनिया,
कोई फ़िक़्र नहीं है,
तुम जो हमारे हो,
और हम जो तुम्हारे हैं. 
 
राघवेश रंजन 

 

 

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

आज कल खुश नहीं रहता हूँ।
खामोश हूँ, कुछ नहीं कहता हूँ।

धीरे धीरे मुहब्बत जवाँ होती है,
बेसब्र हूँ पर इन्तज़ार करता हूँ।

नज़र तेरी अब नज़रअंदाज़ करती हैं,
वक़्त बदलेग, इसलिए सब्र रखता हूँ।

तू पत्थर है, तो पत्थर ही सही,
मैं हूँ फौलाद, पत्थर तराशता रहता हूँ।

गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

बाँट कर रख दिया है तुमने मुझको,
दिमाग और दिल, दो ओर चले जाते हैं।

सोंचता हूँ के कह दूँ के मोहब्बत है तुझसे,
इश्क़ में फैसले, इस तरहा लिए जाते हैं।

उफ़ ये तन्हाई, अकेलापन बर्दाश्त नहीं,
सोंचता रहता हूँ तुझे, पल पल मिटे जाते हैं।

घिस के हाथों को, लकीरें मिटाता रहता हूँ,
तुम्हारे साथ की, गुंजाइशें बनाये जाते हैं।
कुछ वक़्त निकालो,
मिलो तो सही।
मेरा वादा है,
वक़्त लम्हों में सिमट जायेगा।

बेताब दिल की,
सुनो तो सही।
मेरा दावा है,
इश्क़ आंखों का रगों में उतर जायेगा।

दरमियाँ दीवारों को,
तोड़ो तो सही।
फ़रमाया है,
कमबख्त अरमाँ मचल जायेगा।

भूलना चाहते हो?
भूलो तो सही।
दिल का क्या है,
संभलते संभलते संभल जायेगा।